....पथभ्रष्ट हो...जो भ्रष्ट हो....
प्रकृति ने इस संसार में हर कार्य का नियम निर्धारित कर रखा है । पर आश्चर्य है की अच्छे और बुरे का इस संसार में कोई नियम नहीं है !....हो सकता है जो मेरे अनुसार सही है वह किसी और के अनुसार गलत हो ! कारण बड़ा अजीब है क्यूंकि प्रकृति ने हमारे जन्म से लेकर म्रत्यु तक को नियमबद्ध कर दिया पर इसके बीच में हमें स्वतंत्र कर दिया की हम सीखें और स्वयं जानें की सही-गलत क्या है । व्यक्ति की मूलभूत स्वतंत्र स्थिति को स्वयं उस परमशक्ति ने सत्यापित कर रखा है।
परन्तु स्वतंत्रता और स्वछंदता के मध्य जो महीन रेखा है वह सदेव बिसरा दी जाती है । इसी कारण मनुष्य अपने परिवेश से वही सीखता है जो उसकी त्रश्नाओं की स्वतंत्रता को बनाये रखे ।
मेरी समझ में आज की इस सुविधाभोगी दुनिया में यही कारण है मनुष्य के भ्रष्ट आचरण का ! समाज में जिस एक ने सर्वप्रथम अपनी सुविधाओं के लिए इस पथ को अपनाया उसका ही अनुसरण बाकियों को भी सरल प्रतीत होता रहा...और अंततः जिस प्रकार 100 बार बोलने पर असत्य-सत्य हो जाता है वैसे ही यह पथ भी सत्य का मार्ग ही समझ लिया गया !
भारत जैसे क्लिष्ट समाजों में इस चीज को यथार्थ रूप में देखा जा सकता है। इस उच्च आध्यात्मवादी देश में जहां नैतिकता के इतने उच्च आदर्शों को सदेव ईश्वर से जोड़ कर रखा गया वहां धर्म की पकड़ के थोडा सा ढीला होने मात्र से ही आचरणों में इतनी अराजकता द्रश्य होने लगी। सदेव से जीवन की नश्वरता का पाठ पढने वाले भारतीयों को जैसे ही लोकिक सुखों का स्वाद लगा वे सब भूल कर इसी में सलंग्न हो गए।
धर्म..समाज और बहुत हद तक जातिगत बन्धनों से मुक्त हुए भारतीय मानस ने तीव्र सुख प्रप्ति को ही परम सत्य मान लिया। और रही-सही कसर उपभोक्तावाद और भौतिकवाद के प्रवेश ने कर दी ! अंततः हुआ वह जो आज हम देख रहे हैं... अब सारा संसार एक व्यापार क्षेत्र बन गया है जहाँ गणना का एक मात्र मानक लाभ-हानी है ।
स्पष्ट तौर पर हम समझ सकते हैं के भारतीयों के इतना भ्रष्ट होने का कारण क्या है ?! हमारा समाज हमारी शिक्षा प्रणाली हमें केवल धन व सुविधाओं को लक्ष्य मानने पर विवश कर देती है...जब बच्चा बचपन से संसार को केवल व्यापार के रूप में समझता है तो उससे नैतिक आचरण की उम्मीद करना मूर्खता ही होगी। यदि प्रारम्भ से ही उसे नैतिकता का आनंद चखा दिया जाये तो सम्भव है की भविष्य में वह अपने आचरण की परिणति पर सभी के हितों पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में सोच सकने में सक्षम होगा।क्यूंकि किसी सक्षम का भ्रष्ट लाभ जाने कितनों की हानी का कारण हो जाता है।
यह अटल सत्य है की कोई भी बाहरी नियम उतना प्रभावी नही हो सकता जितना की मनुष्य का स्वनियमन । जिस प्रकार शराबी को शराब पीने से कितना भी रोको वह तब तक शराब नही छोड़ता जब तक की उसे स्वयं भीतर से शराब से घ्रणा ना हो जाये उसी प्रकार भ्रष्ट भी तब तक शिष्ट नही होगा जब तक उसे स्वयं इस आचरण से घ्रणा ना हो जाये। और यह घ्रणा उसके मानसिक विकास के कल में ही प्रविष्ट करा दी जानी चाहिए...तभी सम्भव है की हम हमारे गुणसूत्रों में प्रवेश से कर चुके इस भ्रष्टाचार से मुक्त हो पायें...
क्यूंकि जो भ्रष्ट है वह इसलिए क्यूंकि वह पथभ्रष्ट है..!!
जय हिन्द
परन्तु स्वतंत्रता और स्वछंदता के मध्य जो महीन रेखा है वह सदेव बिसरा दी जाती है । इसी कारण मनुष्य अपने परिवेश से वही सीखता है जो उसकी त्रश्नाओं की स्वतंत्रता को बनाये रखे ।
भारत जैसे क्लिष्ट समाजों में इस चीज को यथार्थ रूप में देखा जा सकता है। इस उच्च आध्यात्मवादी देश में जहां नैतिकता के इतने उच्च आदर्शों को सदेव ईश्वर से जोड़ कर रखा गया वहां धर्म की पकड़ के थोडा सा ढीला होने मात्र से ही आचरणों में इतनी अराजकता द्रश्य होने लगी। सदेव से जीवन की नश्वरता का पाठ पढने वाले भारतीयों को जैसे ही लोकिक सुखों का स्वाद लगा वे सब भूल कर इसी में सलंग्न हो गए।
धर्म..समाज और बहुत हद तक जातिगत बन्धनों से मुक्त हुए भारतीय मानस ने तीव्र सुख प्रप्ति को ही परम सत्य मान लिया। और रही-सही कसर उपभोक्तावाद और भौतिकवाद के प्रवेश ने कर दी ! अंततः हुआ वह जो आज हम देख रहे हैं... अब सारा संसार एक व्यापार क्षेत्र बन गया है जहाँ गणना का एक मात्र मानक लाभ-हानी है ।
स्पष्ट तौर पर हम समझ सकते हैं के भारतीयों के इतना भ्रष्ट होने का कारण क्या है ?! हमारा समाज हमारी शिक्षा प्रणाली हमें केवल धन व सुविधाओं को लक्ष्य मानने पर विवश कर देती है...जब बच्चा बचपन से संसार को केवल व्यापार के रूप में समझता है तो उससे नैतिक आचरण की उम्मीद करना मूर्खता ही होगी। यदि प्रारम्भ से ही उसे नैतिकता का आनंद चखा दिया जाये तो सम्भव है की भविष्य में वह अपने आचरण की परिणति पर सभी के हितों पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में सोच सकने में सक्षम होगा।क्यूंकि किसी सक्षम का भ्रष्ट लाभ जाने कितनों की हानी का कारण हो जाता है।
यह अटल सत्य है की कोई भी बाहरी नियम उतना प्रभावी नही हो सकता जितना की मनुष्य का स्वनियमन । जिस प्रकार शराबी को शराब पीने से कितना भी रोको वह तब तक शराब नही छोड़ता जब तक की उसे स्वयं भीतर से शराब से घ्रणा ना हो जाये उसी प्रकार भ्रष्ट भी तब तक शिष्ट नही होगा जब तक उसे स्वयं इस आचरण से घ्रणा ना हो जाये। और यह घ्रणा उसके मानसिक विकास के कल में ही प्रविष्ट करा दी जानी चाहिए...तभी सम्भव है की हम हमारे गुणसूत्रों में प्रवेश से कर चुके इस भ्रष्टाचार से मुक्त हो पायें...
क्यूंकि जो भ्रष्ट है वह इसलिए क्यूंकि वह पथभ्रष्ट है..!!
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